The Dream of Swarajya in Hindi

The Dream of Swarajya

The Dream of Swarajya in Hindi 

इंट्रोडक्शन

जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था तब एक ऐसे बच्चे का जन्म हुआ जिसने आज़ादी पाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. वो जाँबाज़ सिपाही और कोई नहीं बल्कि शूरवीर और महान छत्रपति शिवाजी महाराज थे. उनके जीवन का बस एक ही लक्ष्य था “स्वराज्य” हासिल करना. शिवाजी महाराज, महाराष्ट्र के सबसे महान योद्धा होने के साथ-साथ रणनीति बनाने में बेहद माहिर थे. आज भी वो महाराष्ट्र के गौरव के रूप में जाने जाते हैं. विदेशी हकमत के खिलाफ स्वतंत्रता पाने का संग्राम असल में छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ शुरू हुआ था.

 

ये मध्ययुगीन काल की कहानी है. करीब चार सौ साल से भी ज़्यादा समय तक भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहा. बाहर से आए अत्याचारीयों ने हमारे देश पर कब्ज़ा करके हमारी आज़ादी हमसे छीन कर हमें अपना गुलाम बना कर रखा था. भारत में राजशाही की प्रथा रही थी. यानी राजा के बाद उसकी आने वाली पीढियां राज किया करती थी. ये उस समय की बात है जब आज की तरह प्रजातंत्र की व्यवस्था नहीं थी जिसे हम आज डेमोक्रेसी कहते है. राजा जो बात बोल से, वो जनता के लिए पत्थर की लकीर होती थी. राजा का दिया आदेश ही कानून था. उस जमाने में जनता तो राजा को भगवान मान कर चलती थी पर राजा को जनता की भलाई की रत्ती भर भी परवाह नहीं होती थी.

 

उन्हें तो बस ऐशो-आराम की जिंदगी जीने और अपना खजाना भरने से मतलब था. राजा और राज परिवार के लोगों को हर तरह की सुख-सुविधाएं हासिल थी और हर राजा का एक ही मकसद होता था कि उसके पास बड़ी से बड़ी सेना हो जिसमे दम पर वो अपने दुश्मनों को हराकर उनकी जमीन पर कब्जा करके और भी ज़्यादा शक्तिशाली बन सके. उनके अंदर सत्ता और शक्ति की ऐसी भूख थी जो कभी खत्म होने का नाम नहीं लेती थी.

 

जिन राज्यों को वो अपने कब्जे में लेते थे, फिर उस राज्य के लोगों के सुख-दुःख से उन्हें कोई वास्ता नहीं रहता था. दरअसल दौलत के लालची इन हुक्मरानों के लिए भूखी-नंगी जनता पैरों की जूती के बराबर थी. आम आदमी दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद जो कुछ कमाता, उसका ज़्यादातर हिस्सा राजा के खज़ाने में जाता था. जी-तोड़ मेहनत के बाद भी गरीब की गरीबी मिटने का नाम नहीं लेती थी और ना ही उन्हें अपनी मेहनत की सही कीमत मिल पाती थी. ऐशो-आराम की जिंदगी गजारने वाले इन कर शासकों के अत्याचारों से जनता का जीवन बेहाल था जिनके लिए तीन वक्त का खाना जुटाना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता था. उस जमाने में हमारे देश के लोगों का जीवन सचमुच बहुत दयनीय था. खैर, तब से अब तक ना जाने कितने ही विदेशी हमलावरों के अत्याचार झेलता हमारा देश आज इस मुकाम तक आ पहुंचा है तो अब वक्त आ गया है कि हम अपने देश की तरक्की और खुशहाली में अपना योगदान दे.

 

पर भारत में एक जगह ऐसी भी थी जहाँ की जनता इन अत्याचारों से तंग आकर बगावत पर उतर आई थी, और ये जगह थी महाराष्ट्र. जनता को जल्द ही एक ऐसा बहादुर सिपाही और राजा मिलने वाला था जिसने कसम खाई थी कि वो अपने लोगों की हिफाजत करेगा और इन विदेशी ताकतों से देश को आज़ादी दिलाकर रहेगा. लेकिन इस बहादुर सिपाही की दास्ताँ सुनाने से पहले हम ये समझने की कोशिश करेंगे कि उस वक्त महाराष्ट्र में किस तरह के हालत थे. सोलहवीं शताब्दी के महाराष्ट्र में दो बादशाहों का शासन था, अहमदनगर में निज़ामशाह और बिजापुर में आदिलशाह राज किया करता था.

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ये दोनों आपस में हमेशा लड़ते रहते थे, जनता के दुःख-दर्द से मानो उन्हें कोई लेना-देना ही नहीं था. जनता मरे या जिये उन्हें क्या, उन्हें तो अपना खज़ाना भरना था.

 

इस आपसी लड़ाई में एक दूसरे पर कब्ज़ा करने की होड़ में दोनों आये दिन एक दूसरे पर हमले किया करते थे. उस वक्त महाराष्ट्र में एक से बढ़कर एक शूरवीर और जाबांज सिपाही थे जो दोनों बादशाहों को लड़ाई में अपना सहयोग दिया करते थे.

 

ये मराठा सरदार थे जिनके पास खुद की अपनी एक सेना होती थी. बादशाह को जब किसी लड़ाई के वक्त सिपाहियों की जरूरत पड़ती तो ये मराठा सरदार अपने सेना के साथ उनकी सेवा में हाज़िर हो जाते थे जिसके एवज़ में सुल्तान उन्हें कोई छोटी-मोटी जागीर या ज़मीन का टुकड़ा ईनाम में बख्श दिया करता. मराठा दिलेर, वफादार, ईमानदार और जुबान के पक्के माने जाते थे. एक ईशारे पर जान निछावर करने वाले ये मराठा सैनिक सुल्तान के लिए किसी खज़ाने से कम नहीं थे. ऐसे शूरवीरों की धरती होने के बावजूद महाराष्ट्र गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था. दरअसल ये बहादुर सिपाही सल्तनत के हाथो की कठपुतली थे.

 

इनकी आपसी रंजिश भी एक बड़ी वजह थी जो इन्हें गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए थी. ये मराठा सरदार हमें शा एक दूसरे को नीचा दिखाने की ताक में रहते थे. अगर ये आपसी दुश्मनी भूलकर एकजुट होकर जुल्म का मुकाबला करते तो शायद महाराष्ट्र की जनता को इतने अत्याचार ना सहने पड़ते. पूरे राज्य में अशांति का माहौल था, ताकतवर अपने ताकत के नशे में चूर होकर और ज़्यादा ताकतवर बनने की फिराक में था. इन वजहों से आम आदमी का जीना दिन ब दिन दूभर होता जा रहा था पर इन शूरवीरों को ये बात समझ ही नहीं आती थी कि अगर वो एक साथ मिलकर बगावत करेंगे तो शायद अपने राज्य और जनता को मुक्ति दिला सकेंगे. ये लोग आपस में लड़ते रहे जिसका फायदा सुल्तान बड़ी चालाकी से उठाता रहा. इन सिपाहियों को एक ऐसे मुखिया की जरूरत थी जो उन्हें एक साथ मिलकर एक खास मकसद के लिए लड़ना सिखाए और ये मकसद था, अपने देश और देश की जनता को इन जालिमों से आज़ाद कराना और वो महान सिपाही जल्द ही ताकतवर भोंसले परिवार में जन्म लेने वाला था.

 

वेरुल के भोंसले परिवार में आज तक सिर्फ़ वीरों ने ही जन्म लिया था. निज़ामशाह के वज़ीर मालिक अंबर की नज़र जब मालोजी राजे और उनके छोटे भाई विठोजी राजे पर पड़ी तो वो उनका कायल हो गया. उनकी दोनों भाई परम शूरवीर थे. अंबर मालिक ने सोचा कि दोनों भाई सुल्तान के बड़े काम आ सकते है तो इसलिए उसने उन दोनों को पूने और सुपे की जागीर देने का वादा करके उन्हें निज़ामशाह की सेवा में पेश कर दिया. फिर जल्द ही भोंसले परिवार का नाम सूबे के सबसे बड़े, ताकतवर और अमीर घरानों में गिना जाने लगा. दोनों भाइयों मिलकर जब लड़ाई के मैदान में उतरते तो निजाम के दुश्मनों को गाजर-मूली की तरह काट कर रख देते थे.

 

जिसके एवज में खुश होकर निजाम उन्हें कीमती तोहफों से मालामाल कर देता था. फिर बदकिस्मती से मालोजी राजे इन्दापुर की लड़ाई में मारे गए. उनकी मौत के बाद पुणे और सुपे की जागीर उनके बड़े बेटे शाहजी राजे को मिली. उस वक्त शाहजी राजे की उम्र सिर्फ पांच साल थी इसलिए उनके बड़े होने तक कोई ऐसा इंसान चाहिए था जो उनकी जागीर की सही ढंग से देखभाल कर सके. और तब मालोजी राजे के छोटे भाई विठोजी राजे ने जागीर के साथ-साथ अपने बड़े भाई के दोनों बेटों शाहजी राजे और शरीफ जी राजे की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर उठा ली.

 

फिर कुछ ही सालो में विठोजी राजे ने सिंदखेड़ के लखूजीराव जाधव की बेटी जीजाबाई का हाथ अपने भतीजे शाहजी राजे के लिए माँग लिया. लखजीराव एक बहादर मराठा योद्धा था. सिंदखेड के जाधव भी भोंसले परिवार की तरह ही एक ताकतवर और ऊंचा घराना माना जाता था. दोनों परिवारों के बीच अगर ये रिश्ता हो जाता तो उनकी ताकत कई गुना बढ़ सकती थी. लखूजीराव ने ख़ुशी-ख़ुशी ये रिश्ता स्वीकार कर लिया. जिजाबाई आज़ाद ख्यालों की लड़की थी जिसके अंदर देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी थी. उसने अपने माँ-बाप से राजनीति और युद्ध निति की शिक्षा पाई थी. और एक तरह से वो हमारे देश की आजादी की लड़ाई में अपना अहम योगदान देने जा रही थी. बड़े ही धूम-धाम से शाहजी राजे और जीजाबाई की शादी की गई.

 

शाहजी राजे एक कुशल और बहादुर व्यक्ति थे जो किसी महान राजा की तरह ही अपनी जागीर चलाया करते थे. उनके दरबार में जो भी अपनी समस्या लेकर आता, कभी खाली हाथ नहीं लौटता था. पर भविष्य में क्या लिखा है, ये कौन जान सकता है. राज्य के हालात बिगड़ने वाले थे. मुगल बादशाह की आँखे दक्षिण पर थी और वो पुणे पर हमले की तैयारी कर रहा था जोकि शाहजी राजे की जागीर का एक मुख्य गढ़ था.

 

शाहजी राजे को हारने के लिए मुगल बादशाह और आदिलशाह ने आपस में हाथ मिला लिया था. शाहजी राजे ने अपने भाई शरीफ़जी राजे के साथ मिलकर बड़ी बहादुरी और हिम्मत के साथ मुगल सेना का मुकाबला किया. हालांकि दोनों भाइयों ने मुगलों को बुरी तरह हराया था पर अफ़सोस कि शरीफ़जी राजे इस लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुए. पर इस युद्ध के बाद निज़ामशाह शाहजी राजे की हिम्मत का लोहा मानने लगा था और उसके दरबार में शाहजी की ईज्जत और भी बढ़ गई. पर निजाम का वज़ीर मलिक अंबर जिसने खुद शाहजी को निज़ाम से मिलवाया था, वो अब शाहजी की इस ईज्जत आफज़ाई से जल-भुन कर राख हो गया था.

 

मलिक अंबर से आपसी बैर के चलते शाहीजी राजे ने निजामशाही छोडकर बीजापुर के आदिलशाह का दामन थाम लिया. फिर धीरे-धीरे जब निज़ामशाही की ताकत घटने लगी और निज़ामशाह की माँ ने शाहजी राजे से वापस राज्य में लौटने की प्राथर्ना की तो शाहजी फिर से निजामशाही में लौट आये. पर शाहजी के इस फैसले से आदिलशाह बुरी तरह बौखला उठा. बदले की आग में झुलसते आदिलशाह ने पुणे रियासत को जला कर राख करने का हुक्म दे दिया.

 

शाहजी राजे अपनी पत्नी जीजाबाई को लेकर परेशान थे जो उस वक्त गर्भवती थी और पहली बार माँ बनने जा रही थी. आदिलशाह पुणे पर किसी भी वक्त हमला कर सकता है, ऐसी हालत में जीजाबाई का पुणे में रहना खतरे से खाली नहीं था. तब शाहजी राजे ने फैसला किया कि वो जीजाबाई को शिवनेरी के किले में भेज देंगे जोकि एक सुरक्षित जगह थी. शिवनेरी का किला जीजाबाई और शाहजी राजे के होने वाले बच्चे के स्वागत में पलके बिछाए बैठा था. और आखिरकार वो दिन आ ही गया जिसका सबको बेसब्री से इंतज़ार था. 19, फरवरी, 1630 के दिन जीजाबाई ने एक बच्चे को जन्म दिया.

 

वो बच्चा जो जल्द ही ना केवल महाराष्ट्र का बल्कि पूरे भारत की तकदीर सुनहरे अक्षरों में लिखने वाला था. पर शाहजी राजे और जीजाबाई की खुशियों को जल्द ही ग्रहण लग गया. निज़ाम कान का कच्चा सुल्तान था.

 

किसी गलतफहमी में आकर उसने जीजाबाई के पिता लखूजीराव को अपने दरबार में बुलाकर कत्ल कर दिया था. शाहजी राजे गुस्से में तिलमिला उठे. उन्होंने उसी वक्त निजामशाही छोड़ दी और एक बार फिर आदिलशाह की सरपरस्ती में चले गए.

 

आदिलशाह के दरबार में शाहजी राजे को एक बड़ा ओहदा मिला था और ये बात आदिलशाह के कुछ दरबारियों को रास नहीं आ रही थी. लिहाज़ा उन लोगों ने मिलकर शाहजी के खिलाफ षड्यंत्र रचने शुरू कर दिए जिससे तंग आकर एक बार फिर से शाहजी राजे आदिलशाह का दरबार छोड़ कर चले गये.

 

इसी दौरान निज़ामशाह की मौत के बाद निजामशाही का धीरे-धीरे अंत हो रहा था. राज्य में चारो तरफ अफरा-तफरी का माहौल छाया हुआ था. राज्य की बागडोर संभालने के लिए किसी योग्य व्यक्ति की जरूरत थी. निजामशाही हड़पने के लिए कई लोग तैयार बैठे थे. शाहजी राजे ने सोचा कि जनता की भलाई के लिए एक ठोस निर्णय लेने की जरूरत है और वो भी जल्द से जल्द. शाहजी राजे ने निज़ाम का असली वारिस को ढूंढ कर उसे गद्दी पर बिठा दिया और खुद पुणे की रियासत संभालने लगे. पुणे और सुपे रियासत पर राज्य करते हुए शाहजी राजे को अनुभव हुआ कि जनता की भलाई में ही राजा का प्रमुख कर्तव्य है और जहाँ जनता सुखी और संपन्न है, वही एक खुशहाल राज्य कहा जायेगा. और तभी से शाहजी राजे के मन में स्वराज की कल्पना ने जन्म लिया. वो स्वन्त्रत रूप से पुणे की रियासत संभाल रहे थे.

 

लेकिन उनकी खुशियों को जल्दी ही ग्रहण लग गया. आदिलशाह नई निज़ामशाही को समर्थन दे रहा था जिसे खुद शाहजी राजे ने अपने हाथो से जन्म दिया था. उधर मुगल बादशाह की नाराज़गी बढती जा रही थी. जब तक आदिलशाह को शाहजी राजे का समर्थन प्राप्त था, वो चाह कर भी आदिलशाह पर हमला नहीं कर सकता था. इसी वजह से मगल बादशाह शाहजहां ने खद आदिलशाह को एक धमकी भरा पैगाम भेजा जिससे डरकर बीजापुर के आदिलशाह ने मुगल बाहशाह के साथ एक संधिनामे पर दस्तखत कर दिए और दोनों एक हो गये. अब दोनों मिलकर शाहजी राजे को युद्ध में हारने की योजना बनाने लगे.

 

दोनों सेनाओं को एक साथ पछाड़ना कोई आसान बात नहीं थी, शाहजी राजे बड़ी दुविधा में फंस गए. वो इस युद्ध को टालने का कोई ऊपाय नहीं सोच पा रहे थे क्योंकि अगर लड़ाई होती तो जन-धन का बड़ा नुकसान होता. मजबरन शाहजी राजे को मुगल सल्तनत के साथ समझौता करना पड़ा और उन्होंने संधिनामे पर दस्तखत कर दिए.

 

इन सब वजहों से शाहजी राजे को समय-समय पर अपनी निति में बदलाव करना पड़ा, इस दौरान उनकी पत्नी जीजाबाई और नन्हा बेटा शिवाजी एक किले से दूसरे किले में जाकर छुपकर रहना पड़ता था. शिवाजी को अपने जीवन के शुरुवाती छेह सालो में बड़ी कठिनाईयों से गुजरना पड़ा था पर उनकी माँ जीजाबाई ने उनकी शिक्षा नहीं रुकने दी.

 

हर शाम वो छोटे शिवाजी को अपने पास बिठाकर उन्हें राम, कृष्ण, अर्जुन और भीम की कथाएँ सुनाया करती थी. वो उन्हें सिखाया करती थी कि बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों ना हो पर जीत हमें शा अच्छाई की होती है. शिवाजी के बालमन पर इन प्रेरणादायक कहानीयों का गहरा असर पड़ा.. वीर माँ जीजाबाई ने अपने बेटे को बचपन से ही स्वतंत्रता का पाठ पढाकर उन्हें प्रेरित किया कि वो बड़े होकर अपने देश को विदेशी अत्याचारियों से मुक्त कराकर स्वराज की नींव डाले. वो उन्हें महान संत-महापुरुषों की जीवनियाँ सुनाया करती थी जिससे शिवाजी के मन में बालपन से ही संतो के प्रति अगाध श्रद्धा उत्पन्न हो गई थी. जीजाबाई और शिवाजी जब किलों में रहा करते थे तो शिवाजी वहां के स्थानीय लोगों के साथ घुल-मिल गए थे जिन्हें मावला कहते थे क्योंकि वो ईलाका मावलस कहलाता था.

 

नन्हें शिवाजी स्थानीय लोगों के बच्चो के साथ खेला करते थे और उनके घर भी जाया करते थे. वो उनकी झोपड़ी का रूखा-सूखा भोजन भी बड़े प्रेम और चाव से खाते थे और बदले में उन बच्चो को भी अपने घर बुलाया करते थे, इस तरह शिवाजी की किले के आस-पास रहने वालो के साथ गहरी मित्रता हो गई थी. शाहजी राजे ने जब मुगल बादशाह और आदिलशाह के साथ संधीपत्र पर दस्तखत किये तो दोनों ने मिलकर निज़ामशाही की रियासत आपस में बाँट ली और शाहजी को मंगलौर यानी आज के बैंगलोर जाकर वहां की जागीर संभालने का हुक्म दिया गया.

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शाहजी राजे मंगलोर में पत्नी जीजाबाई और बेटे शिवाजी के साथ रहने लगे. अब उनके जीवन में थोड़ी स्थिरता आ गई थी. मंगलोर में ही शिवाजी की असली विद्या आरम्भ हुई.

 

शाहजी राजे अपने पुत्र को बहादुर सिपाही के साथ-साथ एक विद्वान भी बनाना चाहते थे. इसलिए शाहजी राजे के दरबार में एक से बढकर एक गुणी और विद्वान लोग थे. इतना ही नहीं शिवाजी को शिक्षा देने उन्होंने कई विद्वान पंडितो की व्यवस्था कर रखी थी. और जल्द ही ये बात सिद्ध हो गई कि शिवाजी एक अद्भुत प्रतिभाशाली बालक थे.

 

उन्हें जो भी सिखाया जाता, वो तुंरत सीख जाते थे. छोटी उम्र में ही उन्होंने पढ़ना और लिखना सीख लिया था और रामायण, महाभारत और भागवत गीता जैसे महान ग्रंथो को जुबानी याद कर लिया था. इसके अलावा शिवाजी को बचपन से ही घुड़सवारी, कुश्ती, तलवारबाजी जैसी यूद्ध कलाओं में भी महारत हासिल थी.

 

शिवाजी बड़ी लगन से शिक्षा ग्रहण करते और जो कुछ सीखते उसे अपने जीवन में उतारने की कोशिश करते. गुणी और विद्वान होने के साथ-साथ शिवाजी युद्ध कला में भी पारंगत हो रहे थे. उनके गुरुजनों और माता-पिता को यकीन था शिवाजी एक दिन महान शासक बनेंगे और देश को गलामी की जंजीरों से आजादी दिलाएंगे क्योंकि बहादुरी और बुद्धिमानी का ऐसा संगम कम ही देखने को मिलता था. शाहजी राजे और जीजाबाई अपने बेटे को सही दिशा में आगे बढ़ते देख बेहद खुश थे. पर दुर्भाग्य से भोंसले परिवार की खुशियाँ ज़्यादा देर तक टिक नहीं पाती थी. आदिलशाह का हुक्म था कि शाहजी राजे उसके साथ एक लाम पर चले. जिसका मतलब था कि जीजाबाई और शिवाजी को मैंगलोर में अकेले रहना पड़ेगा. पर शाहजी राजे उन्हें मैंगलोर में अकेले नहीं छोड़ना चाहते थे इसलिए उन्होंने फैसला लिया कि वो दोनों को वापस । पुणे भेज देंगे जहाँ शिवाजी के जीवन का एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा था.

 

पुणे पहुँचकर जीजाबाई को अपने जीवन का सबसे बड़ा धक्का लगा. ये वो पुणे नहीं था जो वो छोडकर गई थी बल्कि वहां सिर्फ राख के ढेर थे. आदिलशाह ने पुणे को पूरी तरह उजाड़ डाला था. वहां रहने वाले लोग अपनी जान बचाने के लिए आस-पास के ईलाको में भाग गये थे. चारो तरफ बर्बादी का मजंर था. घरों की एक ईंट तक नहीं बची थी. यहाँ तक कि खेती लायक जमीन भी बंजर बना दी गई थी. कभी जिन मंदिरों में घंटियों के र थे वहां अब मरघट सी शांति थी. लोगों के चले जाने के बाद पुणे जंगल में तब्दील होता जा रहा था, जिस जगह पर कभी लोगों की बस्तियां थी थी, वहां अब ऊँचे-ऊँचे पेड़ उग आये थे. और सबसे बड़ी बात तो ये थी कि लोगों को जंगली जानवरों जैसे भेडियों के हमले का खतरा सताता था. इन सभी कारणों से लोग पुणे में वापस आने से डर रहे थे.

 

हालात बद से बदतर होते जा रहे थे. तब जीजाबाई ने कसम खाई कि वो पुणे का खोया हुआ वैभव लौटा कर रहेगी. लोग उनकी बड़ी ईज्जत करते थे और उनके दिलो में जीजाबाई के लिए एक ख़ास जगह थी. लोगों ने जब सुना कि जीजाबाई पुणे वापस आ गई है तो लोगों को लगा उन्हें भी पुणे लौटना चाहिए. पर एक डर अभी भी बना हुआ था. वीर माँ जीजाबाई ने खुद लोगों को जाकर समझाया और तसल्ली दी कि वो उनकी देखभाल करेगी और उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं होगी. जीजाबाई की बातो पर लोगों को पूरा भरोसा था इसलिए लोग दुबारा पुणे में आकर रहने लगे.

 

शाहजी राजे ने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि जीजाबाई और शिवाजी पुणे में कोई परेशानी ना हो. उन्होंने उनके लिए लाल महल का निर्माण करवाया ताकि वो लोग वहां आराम से रह सके. जीजाबाई ने पुणे को एक बार फिर से बसाने की जिम्मेदारी अपने कंधो पर ले ली. उन्होंने सबसे पहले मंदिरों की मरम्मत करवाई ताकि लोग सुबह-शाम पूजा कर सके. लोगों का खोया हुआ विशवास लौटाने के लिए ये एक जरूरी कदम था.

 

धीरे-धीरे लोगों के अंदर साहस आया कि वो एक बार फिर से पुणे में आकर रह सकते है दादाजी कोंडे को पुणे और सुपे की जागीर संभालने की जिम्मेदारी दी गई. वो कोंदना के सूबेदार भी नियुक्त किये गये. दादाजी कोंडे जीजाबाई और शिवाजी के बेहद करीबी और वफादार सिपहसालार थे. यही नहीं वो एक अनुशासन पंसद, ईमानदार और कुशल व्यक्ति भी थे. उनकी मदद से जिजाबाई ने कुछ ऐसी व्यवस्था कराई जिससे लोगों का पुणे में रहना आसान हो जाए.

 

उन्होंने घोषणा करवाई कि जो भी भेडियों का संहार करके पुणे को इस परेशानी से छुटकारा दिलाएगा उसे एक बड़ा ईनाम मिलेगा. और साथ ही उन्होंने ये भी फैसला लिया कि जब तक लोग पुणे में अच्छे से बस नहीं जाते, उनसे कोई करवसूली नहीं की जायेगी.

 

उस समय उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता पुणे की जनता थी. पुणे को फिर से बसाने के साथ-साथ जीजाबाई को शिवाजी की पढ़ाई-लिखाई की भी चिंता थी. उनकी पैनी नजरों से कोई बात नहीं छुप सकती थी. उनकी देखरेख में शिवाजी वो सारे युद्ध कौशल सीख रहे थे जो एक शूरवीर को सिखने जरूरी थे. उन्हें दंडपट्टा सिखाया जा रहा था और साथ दुशमनों को चकमा देकर उनके चंगुल से भागने की कला भी सिखाई जा रही थी. इसके साथ ही उन्हें राजनीति का पाठ भी पढ़ाया जाता था ताकि आगे चलकर वो एक कुशल शासक बन सके.

 

शिवाजी की मावला के लोगों के साथ गहरी दोस्ती हो गई थी. मावला के लोग बहुत मजबूत कद-काठी के थे जो उस ईलाके का चप्पा-चप्पा जानते थे. दिन-रात उन लोगों के साथ रहने के कारण शिवाजी भी उस ईलाके की रग-रग से वाकिफ हो गये थे. शिवाजी को अपनी माँ जीजाबाई की सुनाई राम, कृष्ण, अर्जुन और भीम आदि की कहानीयाँ जुबानी याद थी. इसलिए बचपन से ही उनके मन में एक शूरवीर योद्धा बनने की और अपने देशवासियों को दुष्ट और अत्याचारियों के चंगुल से बचाने की ईच्छा थी. यही उनके जीवन का इकलौता मकसद था. वो रात में सोते वक्त भी यही सपना देखते थे. स्वराज एक तरह से उनकी जीवन का लक्ष्य बन चुका था.

 

शिवाजी अपने करीबी लोगों के साथ भी स्वराज की ही बातें किया करते थे, उनके मित्र जो उनकी बातो से प्रभावित थे अब उनके बेहद वफ़ादार बन गये थे. शिवाजी अपने मित्रो और वफादारो को बड़ा सम्मान देते थे. उन्होंने विदेशी लुटेरो से देश की रक्षा करने की जो कसम खाई थी, उनके मित्र और करीबी भी उसमें भागीदार थे.

 

शाहजी राजे की गैरमौजूदगी में शिवाजी पुणे की गद्दी पर बैठकर राज्य चलाने चले. उनके दरबार में उनके साथ ही उनकी माँ जीजाबाई भी बैठती थी जो खुद एक कुशल राजनेता और शासक थी. जीजाबाई शिवाजी को हमें शा सच्चाई और न्याय के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करती थी ताकि शिवाजी एक राजा का फ़र्ज़ ईमानदारी से निभा सके.

 

वो उन्हें ये याद दिलाना कभी नहीं भूलती थी कि वो राम और कृष्ण के वंशज है, और उनकी तरह ही उन्हें अपनी प्रजा की रक्षा करनी है. जीजाबाई नहीं चाहती थी कि उनका बेटा किसी और की छत्र-छाया में अपना राज्य चलाए. वो उन्हें एक स्वतंत्र राजा के रूप में देखना चाहती थी जो गरीब जनता का मसीहा हो.

 

जीजाबाई ने अनुभव किया था कि मराठा सरदार चाहे कितनी भी वफादारी क्यों ना करें पर सुल्तान अपने दरबार में उन्हें वो ईज्जत नहीं देते थे जिसके वो हकदार थे. वो खुद अपनी आँखों से देख चुकी थी कि किस तरह उनके पिता वीर मराठा सरदार लखूजीराव जाधव को आदिलशाह ने भरे दरबार में मौत के घाट उतार दिया था. वो इस बात की भी गवाह थी कि उनके पति शाहजी राजे को कभी वो सम्मान और अधिकार नहीं मिल पाया जो उन्हें मिलना चाहिए था.

 

यही वजह थी कि जीजाबाई अपने बेटे शिवाजी को किसी की गुलामी करते नहीं देखना चाहती थी. उन्होंने शिवाजी के मन में बचपन से ही देशभक्ति के बीज बो दिए थे ताकि वो बड़े होकर अपनी माँ जीजाबाई के स्वराज के स्वप्न को पूरा कर सके. धीरे-धीरे शिवाजी जनता के दुःख-दर्द से जुड़ने लगे थे. वो गरीबो और सताए हुए लोगों की हर मुमकिन मदद करते थे. उनके दरबार से कोई नाउम्मीद नहीं लौटता था, जनता अपने प्यारे शिवाजी से बेहद खुश थी. वो उनके लिए उम्मीद की एक नई किरण बनकर आये थे. लोगों शिवाजी पर उतना ही भरोसा करने लगे थे जितना वो वीर माँ जीजाबाई और शाहजी राजे पर करते थे.

 

जीजाबाई चाहती थी कि जिस लड़ाई की शुरुवात उनके पति शाहजी ने नई निज़ामशाही की नींव डाल कर की थी, उसी लड़ाई का अंत शिवाजी के हाथो से हो. शाहजी ने इस लड़ाई की शुरुवात अपने सिपाहियों के दिमाग में स्वराज का बीज बोकर की थी. पर इससे पहले कि जनता को अपना नेता मिलता, उनका सपना टूट गया पर बेटे शिवाजी को पुणे का राज्य संभालते देखकर शाहजी की उम्मीद एक बार फिर से बंधने लगी थी.

 

तलवारबाजी, कुश्ती, दंडपट्टा, घुड़सवारी में शिवाजी का दूर-दूर तक कोई सानी नहीं था. शिवाजी के दिल में देशप्रेम की आग जल रही थी जो उन्हें चैन से बैठने नहीं देती थी. माँ जीजाबाई के कहे शब्द हरदम उनके कानों में गूंजा करते थे. उन्होंने अपने लोगों पर जुल्म होते अपनी आँखों से देखा था. उनका दर्द उनसे और बर्दाश्त नहीं होता था इसलिए वो इस अत्याचारी शासन का हमें शा हमें शा के लिए अंत कर देना चाहते थे.

 

जीजा बाई जब उनसे स्वराज की बातें करती तो शिवाजी बड़े ध्यान से सुनते थे. माँ की बातो से वो इतने प्रभावित थे कि उनका माँ का सपना उनका खुद का सपना बन चुका था. अब उनके जीवन का बस एक ही उद्द्येश्य रह गया था, जल्द से जल्द स्वराज पाना और उन्होंने कसम खाई थी कि वो इसे हासिल करके ही रहेंगे, अपने लिए और अपने लोगों के लिए. वो एक ऐसा राज्य कायम करना चाहता थे जहाँ गरीब को उसका हक मिले, जहाँ गरीबो पर कोई जुल्म ना कर सके, जहाँ चारो तरफ शान्ति और खुशहाली हो. और ये तभी मुमकिन था जब विदेशी शासकों के हाथो से शासन की लगाम छीनकर अपने हाथ में ली जाए.

 

शिवाजी जानते थे कि सिर्फ बातें करने और स्वराज के सपने देखने से स्वराज नहीं मिलने वाला, इसे पाने के लिए उन्हें और उनके लोगों को बड़ी-बड़ी कुर्बानीयां देनी होंगी. और वो ये भी जानते थे कि अगर उन्हें जान भी देनी पड़ी तो वो पीछे नहीं हटेंगे. पर इतना बड़ी जिम्मेदारी वो अकेले नहीं उठा सकते थे, उन्हें ऐसे लोगों की जरूरत थी जो उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सके. तब शिवाजी ने एक बड़ा फैसला लिया.

 

1645 में रायरेश्वर के मंदिर में शिवाजी अपने मित्रों से मिले.

शिवाजी ने उन्हें वहां पर एक बेहद आवश्यक चर्चा करने के लिए बुलाया था. रायरेश्वर का मंदिर भगवान शिव का मंदिर था. इस गुप्त जगह के बारे में बहुत कम लोग जानते थे. यही वजह थी कि शिवाजी ने इस अहम बैठक के लिए इस जगह को चुना था. वो नहीं चाहते थे कि किसी को इस योजना की भनक तक लगे. शिवाजी के मित्र इस बैठक की चर्चा का विषय जानने के लिए उत्सुक थे. सब उनके बोलने का इंतज़ार कर रहे थे. और जब शिवाजी ने अपनी बात शुरू की तो उनके मित्र दम साधे उनकी बात सुनने लगे.

 

“मेरे दोस्तों, मुझे ये जागीर मेरे पिता से विरासत में मिली है जो आदिलशाह के दरबार में सरदार है. हर चीज़ सकुशल चल रही है पर मैं खुश नहीं हूँ. मेरे मित्रों, कब तक हम इन जालिमो की गुलामी करते रहेगे? कब तक हम इनके आगे हाथ फैलाए खड़े रहेंगे? क्या हम इससे ज़्यादा और कुछ नहीं कर सकते? मेरा कलेजा ये देखकर फटता है कि हमारे लो इन सुल्तानों की आपसी रंजिश का शिकार होकर लड़ाई में बेमौत मारे जाते है.

 

हम चारो तरफ से इन विदेशी हुक्मरानों से घिरे है जिनकी आपसी लड़ाई का शिकार हमारी भोली-भाली जनता हो रही है और हम बस हाथ पर हाथ धरे चुपचाप देख रहे है? हम ये कैसे बर्दाश्त कर सकते है? क्या जमीन के एक छोटे से टुकड़े के लालच में हम जीवन भर इनके गुलाम बने रहेंगे?”

 

वहां मौजूद लोगों की राय जानने के लिए शिवाजी ने उनकी तरफ देखा जो मंदिर परिसर में इकठ्ठा हुए थे. शिवाजी को उनकी आँखों में एक चिंगारी सी धधकती नज़र आई. सब के मन में स्वराज का सपना अंगडाई ले रहा था. उनमे से एक ने कहा” हम तुम्हारा साथ देंगे राजे. तुम्हारी लिए जान भी देनी पड़े तो ख़ुशी-ख़ुशी देंगे. तुम जिस रास्ते पर ले जाओगे, उसी रास्ते पर हम चल पड़ेंगे” उस आदमी के समर्थन में बाकि लोगों ने भी हाँ से हाँ मिलाते हुए कहा” हाँ, हाँ, हम तुम्हारे साथ है राजे” शिवाजी ने अपनी बात जारी रखी. उनके दोस्तों ने उन्हें निराश नहीं किया था, उन्हें पूरी उम्मीद थी कि वो अवश्य उनका साथ देंगे.

 

“अब वो समय आ गया है दोस्तों कि हम एक हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करे जहाँ मेरा, तुम्हारा, हम सबका राज हो. पर एक बात अच्छे से समझ लो, स्वराज इतनी आसानी से मिलने वाला नहीं है. इसके लिए हमें कठिन से कठिन । चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा पर हम पीछे नहीं हटने वाले, चाहे प्राणों की आहुति क्यों ना देनी पड़े. तो आज हम सब मिलकर कसम खाते है कि हम स्वराज स्थापित करके रहेंगे और तब तक कोशिश करते रहेंगे जब तक हम अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते.”

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वहां मौजूद सारे मावलों ने जो पहले से ही शिवाजी को अपना राजा मान चुके थे, एक स्वर में हुंकार भरा” हाँ राजे, हम कसम खाते है, हम स्वराज लेकर रहेंगे” ।

 

शायद ये स्वराज पाने की कसम का असर था या फिर उस वक्त का माहौल ही कुछ ऐसा था पर उस दिन रायरेश्वर महादेव मंदिर के प्रांगण में एक अनोखा नज़ारा देखने को मिला. एक लंबे समय बाद माहौल में स्वतन्त्रता का जोश अनुभव हो रहा था, मंदिर की दीवारे इस जयघोष की साक्षी बनी. चारो तरफ एक उमंग की लहर थी.

 

और वहां से मीलों दूर लाल महल के अंदर जीजाबाई मंद-मंद मुस्कुरा रही थी. अपने वीर बेटे पर उन्हें बेहद गर्व अनुभव हो रहा था. आखिरकार वो दिन ही आ ही गया था जब उनका वर्षो पुराना स्वराज का सपना पूरा होने जा रहा था. उनके बेटे शिवाजी और वीर मावला के दिल में जलती हुई देशप्रेम की ज्वाला उन्हें उनके लक्ष्य की तरफ लेकर जा रही थी.

 

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